Monday, 14 May 2018

धोखा है

अध्याय २४

हे ईश्वर

क्या होता है प्यार? क्यूँ होता है? वो सब तो एक तरफ. मैं आपसे ये पूछना चाहती हूँ कि प्यार के नाम पर आपकी दुनिया में जो होता है वो क्यूँ होता है? आप तो भगवान् हैं, सर्व शक्तिमान हैं, सर्व ज्ञानी हैं. तो फिर आपने क्यूँ नहीं रोका स्वार्थ की आंच में प्यार जैसे पवित्र एहसास को झुलसने से. बताइए न? एक इन्सान जो दुनिया के सामने तन कर खड़ा होता है प्यार उसका सर झुका देता है. एक इन्सान जो एकांत पसंद करता है, प्यार उसे एकाकी बना देता है. एक इन्सान जो अपनी सफलता पर राहत महसूस करना चाहता है, प्यार उसी सफलता को उसकी सबसे बड़ी हार में बदल सकता है. जीवन में अगर कोई न हो तो आप शायद जी सकते हैं लेकिन जब आपके जीवन में कोई आकर आपसे दूर चला जाता है तो जीना बेहद मुश्किल होता है. क्यूँ करते हैं लोग ऐसा? क्या चाहते हैं? अपनी थोड़े देर की ख़ुशी के लिए किसी का जिंदगी भर का सुख चैन क्यूँ बर्बाद करते हैं? रोज़ देखती हूँ ऐसे लोगों को, रोज़ पढ़ती हूँ उनके बारे में. बड़ी भयानक कहानियां हैं भगवान. खुशकिस्मत हूँ कि मेरी कहानी ऐसी नहीं है. मेरी कहानी में धोखा तो है पर इतना नहीं कि मैं संभल न सकूँ. हिम्मत ने मेरा हमेशा साथ दिया है. ऐसा नहीं है कि मैं कभी गिरी नहीं पर उठ भी गई हूँ. फिर से चलने लगी हूँ, जीने लगी हूँ, हंसने लगी हूँ.

हे भगवान लोग इसे पढेंगे तो यही कहेंगे कि प्यार जैसा कुछ नहीं होता. सब झूठ है, फरेब है, धोखा है. धोखा क्या है और किसने दिया? बताइए न? जब समाज को पता चलता है कि कोई किसी से प्यार करता है तब समाज ही तो है जो उस रिश्ते पर कीचड़ उछालता है. प्यार को फरेब बनाया किसने? बताइए न? एक वक़्त था जब प्यार वो एहसास था जिसके लिए लोग ख़ुशी ख़ुशी अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया करते थे. एक ये वक़्त है जब प्यार के नाम पर हत्या, बलात्कार, शोषण और साजिशें. इस सब में प्यार और उसकी मासूम सी ख्वाहिशों के लिए लोगों के पास वक़्त ही कहाँ है? कभी प्यार के खिलाफ लोग लाठी डंडे लेकर खड़े हो जाते हैं और कभी जिसे आपने प्यार किया वो ही आपका विश्वास तोड़ देता है. मैंने भी अपनी पूरी जिंदगी केवल सच्चा प्यार किया है. लोग कहते हैं कि तुम बार बार प्यार कैसे कर सकती हो? क्यूँ नहीं कर सकती भगवान्? अगर कोई मेरी सच्चाई, ईमानदारी और मेरी कद्र नहीं करता तो क्यूँ मैं उसे छोड़ के आगे नहीं बढ़ सकती? क्यूँ एक नई शुरुआत नहीं कर सकती. ये दुनिया बेहद खूबसूरत है भगवान. इसलिए मैं इसकी ख़ूबसूरती पर विश्वास करना चाहती हूँ. जिंदगी को दूसरा, तीसरा और चौथा ही क्या तब तक मौका देना चाहती हूँ जब तक मेरा सपना पूरा नहीं हो जाता. पर अब ऐसा लगता है कि सब कुछ थम जाए. काश यहाँ से मुझे आगे न बढ़ना पड़े.मेरा ये रिश्ता, मेरा ये आज अब तक का सबसे खूबसूरत रिश्ता है. अब तक का सबसे प्यारा आज है. मैं इस आज को अतीत बनते नहीं देखना चाहती. मैं चाहती हूँ कि मेरी जिंदगी में जिस जीवनसाथी की आपने कल्पना की है वो आप ही हो. मेरे ईश्वर हर इन्सान को जीवनसाथी की ख्वाहिश होती है.मुझे भी थी. पर मैंने देखा कि मैं कितना भी सच्चा प्यार करूँ लोग मुझमें बस अपनी कुछ देर की राहत ही तलाशते हैं जिंदगी भर का साथ नहीं. इसलिए धीरे धीरे मैंने अपने लिए वो कल चाहना ही छोड़ दिया. जिसमें साल दर साल जिंदगी भर के लिए कोई मेरे साथ होगा. मेरा मन डरता है कि साल दर साल बदलते चेहरे ही कहीं मेरा मुक़द्दर बन कर न रह जाएँ.
भगवान प्यार इन्सान की ज़रूरत भी है और ख्वाहिश भी. देखा जाए तो बेहद छोटी पर फिर भी बेहद ज़रूरी.

ऐसी ही थी मेरी भी ख्वाहिश कभी. उनका कहना है मुझे बच्चे की ख्वाहिश थी. मुझे बच्चे की नहीं उनके बच्चे की ख्वाहिश है क्यूंकि मैं प्यार को पूरा होते देखना चाहती हूँ. भगवन मेरी ये छोटी सी इच्छा पूरी कर दो. बहुत से लोग मुझे वो सारे नाम फिर से दे देंगे जो मैंने अब तक सुने हैं. पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. जिस तरह आपका समाज किसी मासूम की मदद की पुकार अनसुनी कर देता है मैं भी उसके सारे इल्ज़ाम अनसुने कर दूंगी. प्यार के लिए इतना तो कर ही सकती हूँ. 

Sunday, 13 May 2018

परफेक्ट हो..

अध्याय २३ 

हे ईश्वर 

कितनी दूर आ गयी हूँ मैं. फिर भी नहीं बदली मेरी ज़िन्दगी ज़रा भी. सब कहते हैं तुम ज़िम्मेदारी से भाग रही हो. क्या सच? क्या होती है ज़िम्मेदारी भगवान् और कौन भाग रहा है? याद आता है मुझे हर वो इन्सान जो मेरे रास्ते में तो आया पर साथ चलने के लिए नहीं. कुछ दूर साथ चलके मेरा साथ छोड़ देने वाले हर इन्सान से मैंने पूछा था 'मुझमें क्या कमी है?' सबने यही कहा कि तुम परफेक्ट हो. क्या होता है परफेक्शन भगवान्? क्या होती है सम्पूर्णता? क्या वो जब कोई ये मान लेता है कि एक रिश्ते में झूठ बोलना सच्चाई बताने से बेहतर है. या वो जब कोई आपसे सहारा मांगे और आप उसमें केवल थोड़ी देर की राहत तलाश रहे हों. या फिर वो जिसमें आप ढेर सारे वादे तो कर लेते हैं पर निभाने की शक्ति नहीं रखते. परफेक्शन के एक नहीं कई सारे रूप हैं भगवान् जो मैंने आजमाए हैं और हर बार धोखा ही खाया है. तुम्हारी परफेक्ट दुनिया के परफेक्ट लोग मेरे साथ छुपन छुपाई तो खेल सकते हैं पर सबके सामने मुझे अपना नहीं सकते. अब आप कहोगे क्यूँ बनाती हो ऐसे रिश्ते तुम? कैसे कर लेती हो विश्वास? कैसे सोच लेती हो कि सामने वाला अपने सारे वादे निभाएगा? वो इसलिए क्यूंकि भगवान मैं आप पर खुद से ज्यादा विश्वास करती हूँ. मैं इंसानियत और इन्सान की नेक नीयत पर  भरोसा करती हूँ. मुझे लगता है कि हर इन्सान एक जैसा नहीं होता. इसलिए जब लोग मेरा फायदा उठाते हैं और उसके बाद अपनी स्वार्थान्धता और कायरता को मजबूरी का नाम देते हैं तब मैं सब्र कर लेती हूँ. ये सोच लेती हूँ कि कोई तो होगा जो कायर नहीं होगा. जिसमें हिम्मत होगी मुझे अपनाने की. मैं सारी जिंदगी वो हिम्मत तलाश करती रही.

एक रिश्ते में सुरक्षित महसूस करना मेरा अधिकार है ईश्वर और मुझे सुरक्षित महसूस कराना सामने वाले का दायित्व है. खुशकिस्मती से मेरी कोई आर्थिक मजबूरी नहीं है. फिर भी मुझे मेरे रिश्ते के लिए सामाजिक स्वीकृति और खो देने के डर से मुक्ति चाहिए.

एक उंगली जब उठती है तो सिर्फ मुझ पर ही नहीं मेरे परिवार और मेरे संस्कारों पर भी. जबकि मुझे जो मेरे परिवार से मिला वो बहुतों को नहीं मिलता. मुझे सपने देखने कि आज़ादी मेरे परिवार ने ही दी है. मुझ पर और मेरे हर निर्णय पर पूरा भरोसा मेरे परिवार ने ही किया है. हिम्मत दी है, इंतज़ार किया है मेरा हर सपना पूरा होने का. सब कुछ ठीक हो जाता अगर पहले की तरह मेरी मेहनत और लगन पर सब कुछ निर्भर होता. शादी तो न जाने किस बात पर निर्भर करती है. मुझे डर लगने लगा है भगवान. अपने आप को ज़िन्दगी भर के लिए किसी को दे देने का नतीजा गलत भी तो हो सकता है. कैसे और किस पर भरोसा करूँ? सब कहते हैं अपने परिवार की खातिर ही कर लो न. पर भगवान् शादी परिवार के लिए नहीं अपना परिवार बनाने के लिए की जाती है. लोग ये बात भूल गये हैं और शादी को बायो डाटा, तस्वीरों, कुंडली और न जाने क्या क्या में उलझा दिया है. मैं शादी करना चाहती थी पर वो शादी नहीं जो लोगों को दिखाने के लिए की जाती है.पर वो जिसमें दो इन्सान जिंदगी भर हर सुख दुःख में एक दूसरे का साथ देते हैं.

मेरे ईश्वर मुझे अब कुछ नहीं चाहिए, मैं और कुछ नहीं चाहती. बस एक दुआ मांगती हूँ कि मेरी भटकन को आप विराम दे दो. मुझे थोडा सा सुकून दे दो. मैं अकेले अपने रस्ते पर चल सकूँ, इतनी शक्ति दे दो और विवेक भी. मैं उन सब लोगों से दूरी बनाना चाहती हूँ जिनके पास दुनिया के सामने मुझे अपनाने की हिम्मत नहीं है. उसके बिना जीना आसान तो नहीं है पर सही रास्ता आसान कब हुआ है. इतना ही चाहती हूँ मैं मेरे भगवान कि उस की आँखों में मुझे खोने का डर हो. वो कर रहा हो कोशिशें मेरे साथ आने की. जिस तरह मैंने लोगों की भावनाओं की कद्र की है, वो मेरी कद्र करे. मेरे साथ अगर रिश्ता बनाया है तो उस रिश्ते को सुरक्षा दे दे. और अगर नहीं दे सकता तो छोड़ दे मेरा साथ. कुछ दिन का खालीपन मैं बर्दाश्त कर सकती हूँ पर एक और धोखा नहीं सह पाउंगी. मैं टूट जाउंगी भगवान्. ज़िन्दगी भर के लिए इंसानियत से विश्वास उठ जायेगा मेरा. प्लीज ऐसा मत होने दो. मेरे विश्वास की और मेरे रिश्ते की रक्षा करो भगवान्.

Wednesday, 9 May 2018

सफ़र था वो, मंज़िल नहीं


अध्याय २२ 

हे ईश्वर
बहुत थक गई हूँ मैं खुद को समझाते समझाते. मुझमें कुछ कमी नहीं, उसमें थी. मुझमें कुछ गलत नहीं, उसमें था. मुझमें कुछ झूठा नहीं, उसमें था. मैंने नहीं बदले थे रास्ते, उसने बदले. मैंने तो कोशिश की थी कि हम साथ हो सकें. मैंने समझाया था उसे, कोशिश की थी रोकने की. पर उसने मेरे प्यार को लोगों की नज़रों में एक गंदा मज़ाक बना कर रख दिया. लोग तो छोड़ो, मैं खुद अपनी ही नज़र में दोषी थी. बार बार लगता था, इतना प्यार करने की क्या ज़रूरत थी? करती भी तो क्यूँ उसे एहसास होने दिया मैंने? इसी प्यार का तो लोग फायदा उठाते हैं. तुम्हारी मजबूर दुनिया के मजबूर लोग, अपनी मजबूरी की दीवार नहीं गिरा पाए तो मेरी ही नज़र से गिर गए. क्यूँ बनाते हैं लोग ऐसे रिश्ते जिनकी उम्र इतनी छोटी होती है, पर उनके दिए ज़ख्म उम्र भर रह जाते हैं.  
कई बार की है एक नई शुरुआत मैंने. पर हर बार गलत रास्ता पकड़ा है. मेरे माँ पापा कहते हैं जब आप अपने घरवालों की मर्जी के बिना कुछ भी करोगे तो नतीजा तो यही निकलेगा. पर भगवान् उन लोगों का क्या जो घरवालों की मर्ज़ी से करते हैं सब कुछ. क्या उनके साथ कभी कुछ गलत नहीं होता? हमने इतनी सारी दीवारें बनाई हैं भगवान्. जात बिरादरी धर्म और देश दुनिया – ये सब भी कम पड़ा तो कुंडली और ग्रह नक्षत्र बना डाले. लोग कितना भी कहें कि ये सब अन्धविश्वास है पर ब्याह की गांठ बंधने से पहले एक बार ये फॉर्मेलिटी करते ज़रूर हैं. ‘आजकल ये सब कौन मानता है’ से ‘फिर भी एक बार देख लेने में हर्ज़ नहीं है’ तक जाने में उन्हें समय नहीं लगता.

हे भगवान मैं तो कहती हूँ प्यार की क्यूँ नहीं मिलाईं हैं आपने कुंडलियाँ? जो लोग ‘कैजुअल’  रिश्ते में विश्वास रखते हैं उनको मिलते जुलते लोग मिलें. जो मजबूरी के चलते प्यार की कुर्बानी देने वाले हैं उन्हें उनके जैसे मजबूरों का साथ मिले और वो लोग जो प्यार के नाम पर एक भद्दी गाली हैं, ऐसों को तो कोई न मिले. फिर वो लोग जो जीवन में प्यार तलाश रहे हैं, जिन्हें ऐसा साथी चाहिए जिसका हाथ वो ज़िन्दगी भर थाम कर चल सकें, उन्हें मिले वैसा ही कोई. जो दिलोजान से उनसे प्यार करे. जो हर हाल में उनका साथ दे. जो प्यार या तो न करे और अगर करे तो पूरी ईमानदारी से उसको उसकी जगह और हक दे दे.

तुम्हारी दुनिया में ऐसे भी बहुत सारे लोग हैं भगवान्, जिनसे प्यार संभाला नहीं जाता. वो कर तो लेते हैं प्यार पर उनकी डिक्शनरी में एक शब्द होता है जो उनकी सारी मेहनत, सारी ईमानदारी और सारी कोशिशों पर पानी फेर देता है. वो शब्द है वक़्त. जिस तरह हम एक पौधा लगायें पर उसमें पानी डालना भूल जाएँ तो वो मुरझा जाता है, मर जाता है उसी तरह हम एक रिश्ता अपनाएं और उसे वक़्त और परवाह से सजाना भूल जाएँ तो वो भी जी नहीं सकता.

हमने रिश्तों के बारे में बहुत सी गलतफहमियां पाल रखी हैं भगवान्. रिश्ते बनाना बहुत आसान है और निभाना बेहद मुश्किल. ऐसा कुछ नहीं है. जितना आसान एक रिश्ता बनाना है उतना ही आसान है उसे निभाना. अगर आप उस कल को याद रखें जब आपकी जिंदगी में वो प्यार नहीं था, तो आपका आज बेहद खूबसूरत हो सकता है. हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि जो आज हमारा है, कल न जाने कहाँ होगा. तो वो जब तक है, उसे ख़ुशी दें, प्यार करें, उसकी परवाह करें. हर दिन ऐसे ही जियें जैसे वो आपका उनके साथ पहला दिन हो. एक रिश्ता जो इतना सरल हो सकता है, हम खुद उसे इतना मुश्किल कर देते हैं. मेरे पास वक्त नहीं है – ये वो धीमा ज़हर है जो आपके रिश्ते की जड़ को खोखला कर देता है. मैं जानती हूँ आप अपने पक्ष में तरह तरह के तर्क जुटा रहे होंगे. पर सच! आपका दफ्तर, आपका परिवार और उससे जुड़ी जिम्मेदारियां एक तरफ और दो पल किसी के साथ सुकून से बैठना एक तरफ. हर रिश्ते से जुड़े कुछ खास पल होते हैं जिनको याद रखने में आपका कुछ नहीं जाता.

क्यूँ अकेला छोड़ देते हैं हम अपने प्यार को दुनिया की भीड़ में? क्यूँ देते हैं लोगों को मौका कि वो आपकी जगह ले सकें. ऐसा भी तो नहीं है कि ऐसे लोग कोई जनम जनम के रिश्ते में विश्वास करते हैं और हमेशा के लिए आपकी जगह लेना चाहते हैं. ऐसे लोग आपके रिश्ते की हल्की सी दूरी को एक चौड़ी खाई में बदल देते हैं. बचा कर रखिये अपने प्यार को ‘वक़्त नहीं है’ के ज़हर से. आपकी थोड़ी सी परवाह से आपका रिश्ता बच सकता है. वैसे भी ज़िंदगी भर के लिए किसी का हो जाना दुनिया की सबसे खूबसूरत बात होती है और ये खूबसूरत बात आपके साथ भी हो सकती है.
हे ईश्वर जितने भी सच्चा प्यार करने वाले इस दुनिया में हैं, समझा दो उन्हें. प्यार का इज़हार करने से पहले सोच लें कि कल किसी भी ‘काश, लेकिन और शायद’ को वो अपने रस्ते का रोड़ा नहीं बनने देंगे. उनका वो सच्चा प्यार जो सिर्फ उनकी ख़ुशी चाहता है और बदले में सिर्फ एक मुकम्मल रिश्ता.

Saturday, 5 May 2018

तुम्हारे लिए


मेरे ईश्वर

आपने मेरी दुआ कबूल कर ली पर कितने अलग तरीके से. आज मैं हूँ उसके पास, उसके साथ.आज न जाने कितने दिनों के बाद एक बार फिर पहले जैसी फिक्र जताई उसने, पहले जैसे बातें की, वक़्त बिताया. मन एकदम से शांत हो गया, अजीब सा चुप चाप. पर मुझे डर लग रहा है. उसने इतनी हिम्मत की है आज भगवान्.उसे सही रास्ता दिखा दो. मेरे ईश्वर आपने ही हमें मिलाया है, आप ही उसके मन के सारे वहम हटा दो. प्लीज भगवान् उसे सही और सहज रास्ता दिखा दो. उसे एहसास दिला दो कि वो गलत नहीं है, सपने में भी उसके जैसे इन्सान से कोई गलती नहीं हो सकती.

एक इन्सान जब किसी चीज़ पर विश्वास करने लगता है न तो बहुत मुश्किल होता है उसे उसके विश्वास से परे कुछ और समझाना. ऐसा सिर्फ आप कर सकते हो भगवान्. प्लीज भगवान् उसके मन से पाप के सारे बोझ हटा दो. उसे एहसास दिला दो कि जीवन को चलने और किसी दिशा में मोड़ने वाले आप हो. मेरे सारे निर्णय मैंने आपके हाथों में छोड़ दिए थे. इसलिए कभी सवाल नहीं करती. इसलिए सवाल नहीं किया. इस बात की सज़ा उसे क्यूँ मिले भगवान्? क्यूँ? क्यूँ उसके मन में पाप का बोझ हो? क्या करूँ कि उसके मन की ये दुविधा ख़त्म हो जाये, उलझन मिट जाए.

हे भगवान् आज बहुत दिनों के बाद कितनी सारी प्यारी प्यारी यादें आखों के आगे आ रही हैं. बहुत खूबसूरत जिंदगी दी है आपने मुझे भगवान्. उसके जैसा जीवन साथी देकर आपने उसे पूरा भी कर दिया. जानती हूँ दुनिया और समाज की नज़रों में वो गैर है. समाज तो क्या मेरे अपनों की नज़रों में भी मेरा वो कुछ नहीं. पर ईश्वर प्यार आप ही का रूप है. ये रिश्ता आप का ही तो आशीर्वाद है मेरी ज़िंदगी में. तो कैसे कह दूँ कि वो मेरा कुछ नहीं. याद है किस तरह ढाल बनकर खड़ा हो जाता है मेरी हर मुसीबत के आगे. हम जब भी कहीं जाते हैं भीड़ में मेरा हाथ थाम कर, मेरे आगे खड़े होकर या मेरे लिए बैठने की जगह बना कर जब वो मेरे नज़दीक खड़ा हो जाता है, ज़िन्दगी इतनी प्यारी लगने लगती है. अपने ऊपर बहुत गर्व होता है और उस पर भी जब वो किसी गलत बात का विरोध करने के लिए अपनी आवाज़ उठता है. उसने तो मुझे भी आवाज़ उठाना सिखा दिया.

जब कभी सफ़र के बीच में अचानक वो मुझसे देश दुनिया की बातें करने लगता है, मन करता है सुनती ही रहूँ. आज बेहद लम्बे अरसे बाद कुछ बेहद प्यारी बातें याद आ रही हैं. याद आ रही है उसकी हर खासियत, हर वो खूबी जिसने मेरा दिल जीत लिया. और सबसे ज्यादा याद आती है वो शाम जब मैंने उससे उसका हर सपना, हर ख्वाहिश पूछी थी. हे ईश्वर उसका हर सपना पूरा करो. समाज में उसे उसकी सही जगह दिला दो. जिस तरह मेरी ज़िन्दगी में आपने मुझे सुख, चैन और सम्मान से जीने का मौका दिया, उसे भी दो. भगवान् उसकी बेचैनी मुझसे देखी नहीं जाती. बहुत कर लिया उसने संघर्ष. अब उसे उसकी सही जगह तक जाने दो. प्लीज भगवान्.

हे ईश्वर आपकी दुनिया मुझसे पूछती है क्या रिश्ता है मेरा उससे. क्या बताऊँ? आप ही तो ले आए थे उसे मेरी ज़िन्दगी में और आज आपने उसे मेरी जिंदगी बना दिया. जब वो सर पर हाथ रखता है, ऐसा लगता है आपका हाथ है. कभी दिलासा तो कभी सहारा देता हुआ. कभी शाबाशी तो कभी डांट. वो अजीब सा एहसास जो सिर्फ उसे देख कर आता है. जैसे बच्चा दिन भर अजनबी लोगों के बीच रहा हो और अचानक अपने उसे लेने आ जाएँ. याद है मैं बचपन में अक्सर खो जाया करती थी. आज भी खो गई हूँ. अपने आप को पहली बार मिली हूँ जैसे. मैंने ख़ुशी तो महसूस की है कई बार पर खोने का डर भी बड़ी शिद्दत से महसूस किया है. खोया भी है. फिर जीना भी सीखा है चीज़ों के बिना, रिश्तों के बिना, प्यार के बिना. पर उसके मिलने के बाद लगता है कि अब मुझे और भटकना नहीं पड़ेगा. ख़त्म हो गई है मेरी तलाश. पूरा हो गया है मेरा अधूरापन.

सब मुझ पर नाराज़ हैं क्यूंकि मैंने आपको अपनी ज़िन्दगी में जगह दी है. सब आपसे नाराज़ हैं क्यूँकि आपने मेरा साथ दिया. हम सबको तो मना नहीं सकते. पर आपसे कह रहे हैं भगवान आप इन नाराज़ लोगों से हमें बचा लो. हमारे प्यार को बचा लो. प्लीज भगवान्.

Thursday, 3 May 2018

लग जा गले


अध्याय 20 

हे ईश्वर

की होलो कोलकाता? कॉस्मोपॉलिटन, बुद्धिजीवी वर्ग, लाल सलाम के झंडे लेके चलने वाला एक ज़रा सी नजदीकी से इतना घबरा गया? क्यूँ? पटे पड़े रहते हैं अखबार और सोशल मीडिया हैंडल्स...खून में डूबे सड़क पर पड़े लोग हों या खून करके उसे अपलोड करने वाले. सड़क चलती लड़कियों से बदसलूकी के किस्से या जानवरों से क्रूरता के वीभत्स नज़ारे...ये सब देख कर अनदेखा करने वाले लोग आज प्यार जैसे मासूम एहसास से इतना नाराज़ हो गये? सही है.
खैर तुमसे तो क्या कहूँ?

शुक्रिया भगवान्. वो वापस आ गये हैं पर थोड़े से बदले बदले से हैं. किस्मत, कुंडली, लकीरों की बातें करते हैं और मेरे दिल की धड़कन की नहीं. थोड़े दिन का साथ है कह कर एक दूरी बनाने को कहते हैं और ये नहीं सोचते कि उनसे दूर होकर मैं खुद के भी नज़दीक नहीं रह पाऊँगी. दोस्ती निभाने के लिए कहते हैं पर दोस्ती की सीमारेखा तो कब की टूट चुकी है, अब कैसे उस मोड़ से वापस लौट आऊँ? अब तो वो जिंदगी हैं मेरी. आज फिर उन्होंने गुस्से में क्या कुछ नहीं कहा. आज पहली बार मुझे लगा कि इस इन्सान के या किसी भी इन्सान के सामने अपना दिल और अपने अतीत के पन्ने खोल कर मैंने बहुत बड़ी गलती की है. अगर इनकी हमदर्दी और नेक सीरत पर विश्वास करके अपनी कहानी इन्हें नहीं बताती तो शायद आज इनके पास कहने को इतना कुछ नहीं होता. इस तरह मेरे ज़ख्मों पर नमक छिड़कने का बहाना नहीं होता. इस तरह मुझ पर उंगली उठाने का सबब नहीं बनता. एक पल को तो कानों पर विश्वास नहीं हुआ. जिस इन्सान ने मेरे हर ज़ख्म पर मरहम रखा था वो आज मुझे गलत ठहरा रहा था. मुझे कह रहा था कि मैं किसी एक के साथ रह ही नहीं सकती. खुश रह ही नहीं सकती.

मेरे भगवान्, मेरी ज़िंदगी में आने वाला हर इन्सान इतना कायर क्यूँ था? जवाब दो मुझे. जिन लोगों को मैंने एक अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए साहस दिया, जिनकी मुश्किल में उनका हौसला बढ़ाया, जिनके रस्ते की मुश्किलें दूर करने की कोशिश की, वो सब आज मेरे साथ नहीं हैं. मेरी वजह से जिनकी ज़िन्दगी आसान हुई थी आज वो ही मेरी हर मुश्किल की वजह बने हुए हैं. मेरे अतीत के कारण मेरे आज पर लोग बड़ी आसानी से उंगली उठा देते हैं, भूल जाते हैं कि अतीत बदला नहीं जा सकता. उसे सिर्फ भूला जा सकता है. उस से सीख लेके आगे बढ़ सकते हैं, उसके बोझ तले दब कर अपने आपको सजा नहीं दी जा सकती. माफ़ क्यूँ नहीं कर देते लोग मुझे. मेरी गलतियों के लिए...

हमारा रिश्ता कभी बराबरी का रिश्ता था ही नहीं. जिस रिश्ते में मेरा एक इन्सान से बात करना भी उनको गवारा नहीं है उसी रिश्ते में रहकर भी वो न जाने किस किस को मिलते भी हैं और साथ वक़्त भी बिताते हैं और इस बात को गलत भी नहीं मानते. मुझसे किया वादा उनको याद भी नहीं रहा और किसी से एक ऐसा वादा कर आए जिसने मुझे अन्दर से तोड़ दिया. कहते हैं पिछले दो तीन महीनों में मैंने उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया. मुझे अपनी सारी गलतियों का एहसास है भगवान् पर काश कभी वो भी समझते. मैंने किसी से बात कर भी ली तो उससे कुछ बदल तो नहीं गया. मैंने प्यार किया था कभी उस इन्सान से. आज अगर उसे मेरी ज़रूरत पड़ी तो कदम पीछे नहीं खींच पाई मैं. उसको मना नहीं कर पाई, वो मेरी मजबूरी थी भगवान् खुदगर्जी नहीं.

उनका कहना है अगर तुम खुश नहीं हो तो मत रहो मेरे साथ. मैं कहाँ जाऊं भगवान्? बताइए न? क्या होती है ख़ुशी भगवान्? मैं अपने आप से ज्यादा उन पर भरोसा करती हूँ. उनके साथ मैंने जिस सुरक्षा, जिस सम्पूर्णता को महसूस किया, वो लोगों को ज़िन्दगी भर खोजने से भी नहीं मिलती. मैंने कभी उनसे कहा था मैं उनसे मिलना नहीं चाहती. मैं उनसे मिल कर खुद को भूल जाती हूँ. उनके रिश्तेदारों को उनकी फिक्र है. पूरे समाज को उनकी फिक्र है. एड़ी चोटी का जोर लगाये जा रहे हैं लोग उन्हें मुझसे अलग करने के लिए. पर भगवान् मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ गलत साबित करो सब को. साबित करो कि मुझे और मेरे जैसी हर लड़की को एक नई शुरुआत करने का हक है.

वो कहते हैं जब तुम शादी करोगी तब करूंगा सवाल तुमसे. आप बताओ न? आपने लिखा है क्या कोई और मेरी किस्मत में? क्यूँ लिखा है भगवान्? क्या मेरा मेरी खुशियों पर कोई हक नहीं? क्या मुझमें एक रिश्ता निभाने की काबिलियत नहीं? क्या मैं इस लायक नहीं कि इनके साथ रह सकूँ? कैसी शादी होगी वो जिसमें वो समर्पण ही नहीं होगा? क्या कोई मजबूरी होगी या समझौता कोई जिसके चलते अपना इतना प्यारा रिश्ता मैं तोड़ दूंगी? मत करो ऐसा भगवन. मुझे और टुकड़ों में मत बांटो. प्लीज भगवान्.

Tuesday, 1 May 2018

मुंह की बात सुने हर कोई....


अध्याय १८ 

मेरे ईश्वर

कल आपका दरवाज़ा मुझे पहली बार बंद मिला. ऐसा लगा जैसे लम्बी यात्रा करके कोई कहीं आया हो और थक कर सुस्ताने के लिए कोई जगह न मिले. आप जानते हैं आपकी इन्हीं छोटी छोटी बातो में मैं अपने सारे जवाब खोजा करती हूँ. खैर आप चाहें तो कह सकते हैं कि तुमने दरवाज़ा खुलने का इंतज़ार क्यूँ नहीं किया. मैं भी तो कर सकती हूँ आपसे इतने सारे सवाल. पर हम दोनों ही चुप रहते हैं. वो भी चाहे तो कर सकते हैं मुझसे सवाल पर वो तो सवाल नहीं करते भगवान सीधे इल्जाम लगाते हैं. मैंने किसी से सिर्फ बात कर ली तो वो मेरा पक्का वाला दोस्त करार दे दिया जाता है. वो भी वो दोस्त जिसको मैं छुप छुप कर मिलती हूँ...छुप छुप कर भगवान्? सच में?

मुझे याद है कि एक दिन मैंने उनसे कहा था ‘कभी कभी एक दोस्त की ज़रूरत पड़ जाती है. किसी से बात करने की इच्छा होती है. कुछ बांटने का मन करता है. देश दुनिया के हालात, समाज की स्थिति, काम से जुड़ी बातें किसी से कहने की इच्छा होती है. और ये इच्छा शायद हर इन्सान की होती है. उनसे कहा था तो उन्होंने बोला था कि मैं हूँ तुम मुझसे बात किया करो. पर जब दिल से इतनी दूर कर दिया उन्होंने तो ये मुंहबोली दोस्ती मैं कैसे निभाऊँ? बोलो न भगवान्?

आप उनको इतना तो एहसास दिला दीजिये कि इन्सान गलतियों का पुतला होता है. ये उन्हीं के शब्द हैं. रिश्ते में बराबरी हर इन्सान का हक़ होता है. अगर उनके गुस्से, उनकी नाराज़गी को मैंने समझने की कोशिश की, तो उन्हें भी बड़ा दिल रखकर मुझे माफ़ कर देना चाहिए. कोई भी बुराई इन्सान का पीछा आसानी से नहीं छोड़ती. मेरे अन्दर की कड़वाहट को सिर्फ देखते हैं वो, समझते नहीं. सतह के ऊपर का मेरा गुस्सा नज़र आता है उनको, अन्दर की वो दुखती रग नहीं, जिस पर हाथ रखा उन्होंने और मेरा दिल दुखा दिया. क्यूँ भगवान्? अजीब बात ये है कि मेरे अन्दर झाँकने की उनकी काबिलियत ही मुझे उनके इतने करीब ले आई थी कि मैंने अपने सारे ज़ख्म उनके आगे खोल कर रख दिए. आज इसी बात पर मुझे पहली बार अफ़सोस हो रहा है. इसलिए नहीं कि उन्होंने इस बात का कुछ गलत फायदा उठाया. पर इसलिए कि जब वो जानते हैं मेरे लिए किसी के करीब आना मुश्किल है तो दूर जाना भी तो उतना ही मुश्किल है. कल की उस नजदीकी की इतनी आदत पड़ गई कि आज की ये दूरी खल रही है मुझे.

उस पर भी वो मुझे पूरी तरह अकेला भी नहीं छोड़ रहे. बात भी करते हैं, फिक्र भी जताते हैं. आज भी मुझसे जुड़ी हर बात की फिक्र है उनको. उनकी ये फिक्र ही मुझे उनसे दूर नहीं होने देती. अगर ये बात साफ़ हो जाती कि उन्होंने सच में वो दूरी बना ली है जिसका वो दावा करते हैं, तो मैं उस खालीपन के साथ साँस लेना सीख जाती धीरे धीरे. पर वो तो मुझसे जब भी दूर होते हैं, मेरे और नज़दीक आ जाते हैं. वो और लोगों से बिलकुल अलग हैं. इस बात का एहसास है मुझे. ‘तुम स्वछन्द हो’ कहने वाले ने मेरी समझदारी पर भरोसा करके ही सौंपी है ये स्वछंदता मुझे. उसे पता है मैं इस बात का कोई गलत फायदा उठाने वाली नहीं. पर पता नहीं ये स्वछंदता भी कितनी है. अकेले ही जाना है तो कहाँ तक, बता देते वो. क्या अब हर काम बिना उनसे सलाह लिए करूँ? चलाऊं वो ‘अपनी मर्जी’. करूँ जैसा ‘मुझे ठीक लगे’. किसी के आगे झुकने की एक सीमा होती है भगवान्. मेरे लिए वो सीमा अब आ चुकी है. अगर मेरे बारे में हर बात जानने वाला भी मुझे नहीं समझ पा रहा तो अब मुझे किसी को कुछ नहीं समझाना. कहना ही नहीं कि साथ चलो. बताना ही नहीं की चल क्या रहा है.

भगवान् प्लीज हाथ जोडती हूँ. जैसे ही मेरी ज़िंदगी में थोड़ा सा सुकून आने लगता है, पता नहीं कौन उस सुकून में आग लगाने वाली हरकतें मुझसे करवा देता है. मुझे नहीं पता. लौटा दो मेरा वो सुकून भगवान् जो उसका चेहरा दख कर मिलता है मुझे.

मेरे मन से ये सारे वहम निकाल दो जो मेरी खुशहाल ज़िंदगी का रोड़ा बने हुए हैं. उसे लौटा दो भगवान्. इसी उम्मीद पर तो साँस लिए जा रही हूँ मैं. एक दिन वो मेरी गलती को माफ़ कर देंगे. एक दिन उनका मन साफ़ होगा, समझ आएगी उन्हें मेरे गुस्से की वजह. उस दिन वो लौट आयेंगे. ज़रूर लौट आएंगे.

अब नहीं आओगे?


अध्याय १८ 

हे ईश्वर 

‘सॉरी मैं नहीं आ सकता.’ यही कहा न आज तुमने? मत आना, कभी मत आना. तुम्हें कोई नहीं बुलाएगा. कोई तुम्हारा रास्ता नहीं देखेगा अब. कोई तुम्हारे लिए पलकें नहीं बिछाएगा. आखिरकार तुमने भी अकेला छोड़ दिया है मुझे. पर अपने अकेलेपन को किसी से बाँटने की मेरी हिम्मत नहीं है अब क्यूंकि जो भी मेरा अकेलापन बाँटने आता है, वो मुझे और भी अकेला ही कर के जाता है. कह दिया आज तुमने मुझे कि अपने अन्दर भी झाँक के देखूं. तुमने तो देखा था. क्या यही देख पाए थे? मेरा गुस्सा और उसी गुस्से में कहे गये शब्दों के अलावा तुम्हें आज कुछ नज़र नहीं आ रहा. समझ नहीं पाती हूँ मैं कभी कभी! आपकी गलती हो तो माफ़ कर दो और आगे बढ़ो. उस एक गलती से रिश्ता तो नहीं टूट जाता न. मेरी गलती हो तो और कुछ हो न हो रिश्ते पर आंच सबसे पहले आ जाती है. कई बार खुद अपने आप अपनी गलती मान कर झुक कर मनाया है आपको. आज भी वही किया. पर आप ही के शब्दों में ‘अब तो गला भी काट के रख दूँ तो कुछ नहीं होने वाला.’ तो ठीक है, न हो तो न सही. मैंने तुमसे इतना प्यार किया क्या मैं तुम्हारे लिए इतना भी नहीं कर सकती? गला ही काट के रख देती हूँ. देखती हूँ कुछ होता है या नहीं!

वैसे भी आपके लिए तो जितना भी करूँ उतना कम है. आपने भी तो इतना कुछ किया. मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं किसी के लिए इतना मायने रख सकती हूँ. कोई मेरे हर दर्द की दवा खोज लाने के लिए इतना बैचैन हो सकता है. कोई इस तरह मेरा ख्याल रख सकता है कि न होकर भी मेरे आस पास एहसास रहता है उसका. कोई जिसने आकर मेरी हर चिंता, मेरी हर फिक्र अपने ऊपर कुछ ऐसे ले ली कि अब मैं अपने बारे में सोचना ही भूल चुकी हूँ. एक बात बताओगे आप? अब क्या करूँ अगर रस्ते में अचानक गाड़ी ख़राब हो जाये? अब किसका नंबर लिखूं हर उस जगह जहाँ मुझे अपना नंबर देना सहज न लगे? अब किसे कहूँ कि मुझे घर छोड़ दे अगर दफ्तर में कभी देर हो जाये तो. अब अगर कहीं जाने का मन करे तो किसकी इज़ाज़त लेके जाऊं? अब किसे बुलाऊँगी अगर अचानक कभी रास्ता भूल गयी तो. आप तो अब नहीं आओगे. सच बताओ न. क्या सचमुच नहीं आओगे?

एक बात है जो मैंने आज तक आप से छुपा कर रखी. आज कह देती हूँ. जो कुछ आपने मेरे लिए किया, वो सब मैं खुद भी कर सकती थी. पर बहुत अच्छा लगता है आपसे कोई भी काम कहना. अच्छा लगता है जब आप मुझे समझाते समझाते डांट देते हैं. अच्छा लगता है जब इतने गुस्से में भी आप मुझे हक से कहते हैं कि इधर उधर कहीं जाने के बजाय सीधे घर चले जाना. अच्छा लगता है जब आप उलटे सीधे बहाने बना कर मुझे फ़ोन करते हैं बस ये जानने के लिए कि मैं ठीक से घर पहुँची या नहीं.  अच्छा लगता है जब आप मुझे एहसास दिला देते हैं कि आप आस पास ही हैं. मेरे साथ ही हैं. अच्छा लगता है जब आप मुझे सलाह भी देते हैं और ये भी कहते हैं कि जो मर्जी आए करो. अपनी मर्जी चलानी होती तो न! अभी तो अच्छा लगता है आपकी हर बात सर झुका कर मान लेना. मैं घूमने जाना चाहती हूँ पर जाऊँगी नहीं. आपको फिक्र जो है इतनी मेरी. मैं जानती हूँ भले ही देखने वालों को लगता हो कि आप को पता नहीं चल क्या रहा है, पर आप मेरी एक एक हरकत से बखूबी वाकिफ हैं. लोगों को लगता है कि मैं अकेली हूँ पर मैं अकेली नहीं हूँ. आपने कहा है कि आप नहीं आयेंगे पर आप गये ही कहाँ हैं जो आप वापस आयेंगे.

बहुत कुछ है जो करना रह गया है और मैं आपकी एक हाँ का इंतज़ार कर रही हूँ. काश एक बार फिर आप कह दें, आता हूँ. पर आप तो अब आयेंगे नहीं. है न?  

अकेले हैं तो क्या गम है

  तुमसे प्यार करना और किसी नट की तरह बांस के बीच बंधी रस्सी पर सधे हुए कदमों से चलना एक ही बात है। जिस तरह नट को पता नहीं होता कब उसके पैर क...